{Best} 15+ Small Moral Story in Hindi – बच्चों के लिए छोटी-छोटी कहानियां

Small Moral Story in Hindi
Small Moral Story in Hindi

Small Moral Story in Hindi मैं पढ़ना पसंद करते हैं तो आपका हार्दिक स्वागत है हमारे इस कहानी से भरे भंडार में नैतिक कहानियां वह भी हिंदी में पढ़ना या सुनना सभी को पसंद है चाहे वह कोई बड़ा व्यक्ति हो या कोई बच्चा हमारे पास Small story for kids in Hindi का ढेरों मोरल स्टोरीज उपलब्ध है और यह सभी Small children story in Hindi के साथ खास तौर पर आपके लिए उपलब्ध कराया गया है।

1. केकड़े की यात्रा – Small Moral Story in Hindi

काफी समय पहले की बात है। किसी समुद्र तट पर एक केकड़ी अपने एक बच्चे के साथ रहती थी। उसने रेत के अंदर अपना घर बना रखा था। नन्हा केकड़ा अपनी मां के साथ रोजाना सैर करने जाता था। वे समुद्र में तैरती मछलियों को देखते और ठंडी हवा का खूब आनंद लेते।

एक दिन शाम के समय वे दोनों समुद्र के किनारे टहल रहे थे। तभी केकड़ी ने अपने बेटे से कहा, “बेटा! तुम उस तरफ नहीं, बल्कि इस तरफ चलो।”

केकड़ी का बेटा चिंतित होकर बोला, “कोई बात नहीं, मां! अगर मैं उधर चलूंगा, तो क्या हो जाएगा? इससे क्या फर्क पड़ जाएगा। तुम ऐसा क्यों कह रही हो। क्या मैं कुछ गलत कर रहा हूँ?”

“हां बेटा, तुम अपने शरीर का बायां हिस्सा झुकाकर चल रहे हो। यह देखने में अच्छा नहीं लगता। तुम्हें सीधे होकर चलना चाहिए। यह देखने में भी अच्छा लगता है। इससे तुम्हारे शरीर पर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ेगा।” केकड़ी ने बड़े प्यार से अपने बेटे को समझाया।

केकड़ी के बेटे ने कुछ देर अपनी चाल को ध्यान से देखा, फिर मां से बोला, “तुम ठीक कहती हो मां क्या तुम मुझे बता सकती हो कि सही तरीके से कैसे चलना चाहिए, ताकि मैं भी सीख सकूं?” बेटे की बात सुनकर केकड़ी को बहुत अच्छा लगा। उसने अपने बेटे के आगे-आगे चलना शुरू कर दिया।

Small Moral Story in Hindi

लेकिन वह चाहकर भी सीधा नहीं चल सकी, जैसा कि वह चलना चाहती थी। केकड़ी ने बहुत कोशिश की, लेकिन सब व्यर्थ रहा। वह स्वयं भी बाईं ओर झुककर चल रही थी। फिर चलते-चलते वह रेत पर गिर पड़ी। समुद्र तट पर मौजूद सभी प्राणी उसे देखकर बेतहाशा हंसने लगे।

केकड़े की मां अपने व्यवहार पर बहुत शर्मिंदा हुई। उसने अपने बेटे से कहा, “तुम जैसा ठीक समझो, वैसे चल सकते हो । मुझसे गलती हो गई कि मैं तुम्हें बदलना चाह रही थी। तुम्हें ठीक उसी तरह चलना चाहिए, जैसे तुम्हें चलने में सुविधा हो।”

यह सुनकर बेटे ने अपनी मां केकड़ी को गले से लगा लिया। फिर दोनों अपने घर की ओर चल दिए। केकड़ी ने यह समझ लिया था कि चलने की इस आदत में कोई सुधार नहीं हो सकता, क्योंकि हर प्राणी का चलने-फिरने का तरीका अलग-अलग होता है और इसे कोई नहीं बदल सकता। 


2. मछुआरा और उसका कांटा – Small story for kids in Hindi

किसी नदी के पास एक मछुआरा रहता था। वह रोजाना मछली पकड़ने वाला कांटा लेकर नदी में मछलियां पकड़ने जाता था। मछलियां पकड़ने के बाद वह बाजार जाता और उन्हें बेचकर घर वापस लौट आता।

वह मछुआरा अपने साथ मछली पकड़ने वाला एक हुक भी रखता था। वह हुक बहुत नाजुक था। उससे केवल छोटी मछलियां ही पकड़ी जा सकती थीं। एक दिन सुबह मछुआरा नदी के किनारे गया और मछलियां पकड़ने का कांटा पानी में डालकर वहीं बैठ गया। वह कई घंटे वहां बैठा रहा, लेकिन उसके हाथ कोई मछली नहीं लगी।

उसने सोचा, ‘आज का दिन मेरे लिए बहुत बुरा है। कोई भी मछली नहीं फंसी। आज मेरा परिवार क्या खाएगा।’ शाम होते-होते मछुआरा उदास हो गया और अपने घर वापस जाने का निश्चय किया। जब मछुआरे ने अपना मछली पकड़ने का कांटा पानी से बाहर खींचना चाहा, तो वह उसे कुछ भारी-सा लगा। मछली पकड़ने का कांटा पानी से

निकालना मुश्किल लग रहा था। उसने सोचा कि जरूर उसमें कोई बड़ी मछली फंसी है। वह बहुत उतावला हो गया। लेकिन उसने यह बात समझ ली कि यदि वह अपने कांटे को जोर से वापस खींचेगा, तो वह टूट सकता है। यह सोचकर मछुआरा उदास हो गया। लेकिन उसके दिमाग ने फिर से काम करना शुरू कर दिया।

उसने सोचा, ‘यदि मैं अपने कांटे को धीरे-धीरे खींचता हूं, तो वह बाहर आ सकता है और मछली भी मेरे हाथ लग सकती है। इस तरह मछली पकड़ने का कांटा नहीं टूटेगा और मैं अपने परिवार के लिए खाने का इंतजाम भी कर सकता हूं।”

मछुआरे ने अपना दिमाग शांत किया और धीरे-धीरे कांटे को पानी से बाहर खींचने लगा। अब वह आसानी से देख सकता था कि कांटे के साथ-साथ पानी से एक मछली भी बाहर आ रही है। शीघ्र ही उसने मछली को बाहर निकालकर उठाया और अपने घर की ओर चल दिया।

अब मछुआरा बहुत खुश था। वह जल्दी-जल्दी बाजार की ओर कदम बढ़ाने लगा, ताकि मछली को बेचकर कुछ सामान खरीद सके। अगर मछुआरे ने कांटे को धीरे-धीरे खींचने के बजाय जोर से खींच लिया होता, तो उसका कांटा टूट जाता और कांटे के साथ-साथ मछली भी नदी में गिर जाती। (Small Moral Story in Hindi) 


3. हिरन और शिकारी

काफी पुरानी बात है। एक दिन दो शिकारी जंगल में शिकार करने गए। वे अपने घोड़ों पर सवार होकर दिन भर जंगल में घूमते-घूमते काफी थक गए। लेकिन उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। अतः वे अपने घोड़ों से उतरे और एक पेड़ के नीचे बैठकर आराम करने लगे।

तभी एक शिकारी ने कुछ दूरी पर एक हिरन को घास चरते हुए देखा। उसने सोचा, ‘आज का मेरा दिन बहुत अच्छा है।’ इसके बाद शिकारी ने धीरे से अपना तीर-कमान उठाया और हिरन की ओर बढ़ने लगा। तभी हिरन ने उसे देख लिया। हिरन जानता था कि शिकारी उसे मार डालेगा, इसलिए वह घबराकर तेजी से दौड़ने लगा। हिरन किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में था।

शिकारी भी अपने घोड़े पर सवार होकर उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। तभी हिरन ने पास ही अंगूर की एक बेल देखी और उसके पीछे छिप गया। शिकारी हिरन को नहीं देख सका और उसे ढूंढ़ता हुआ आगे बढ़ गया। उसन समझा कि शायद हिरन आगे भाग गया है।

थोड़ी देर बाद हिरन अंगूर की बेल से बाहर आया और इधर-उधर देखने लगा कि शिकारी है या चला गया। शिकारी को न देखकर हिरन ने चैन की सांस ली और बोला, “भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि आज मेरी जान बच गई।

यदि शिकारी ने मुझे यहां देख लिया होता, तो आज मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होता।” हिरन शिकारी से बचने के लिए दौड़ते-दौड़ते काफी थक गया था और उसे भूख भी लग गई थी। उसने अंगूर की बेल पर लगी पत्तियां देखीं। वे उसे बहुत मजेदार लग रही थीं। अतः उसने शिकारी को भूलकर अंगूर की पत्तियां खानी शुरू कर दीं।

तभी शिकारी उधर वापस आ गया। उसने हिरन को अंगूर की पत्तियां खाते हुए देखकर तुरंत अपना तीर-कमान उठाया और उसकी ओर निशाना लगा दिया। शिकारी का तीर सीधे हिरन के दिल में जा लगा। वह खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ा।

मरते समय हिरन सोच रहा था, ‘में कितना मूर्ख था। जिन पत्तियों ने छिपने में मेरी मदद की थी, मैं उन्हीं पत्तियों को खा रहा था। इसलिए मुझे अपने स्वार्थ की सजा मिल गई।’ वस्तुतः जो आपको आश्रय दे, उसे कभी नष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। (Small Moral Story in Hindi) 


4. ईसप और ब्रेड का डिब्बा

ईसप एक धनवान सेठ के घर में नौकर था। सेठ के पास कई नौकर थे, जो उसकी जरूरतों का ध्यान रखते थे। लेकिन ईसप उन सभी नौकरों में सबसे अधिक चतुर था। वह अपना सारा काम समय पर समाप्त कर लेता था। ईसप सेठ का सबसे प्रिय नौकर था।

उस धनवान सेठ को घूमने का बहुत शौक था। एक दिन उसने पास के एक शहर में जाने का विचार किया। सेठ ने सभी नौकरों को आदेश दिया कि वे एक-एक करके सारे डिब्बे उठाएं। सभी नौकर आए और उन्होंने हल्के-हल्के डिब्बे उठाने शुरू कर दिए। लेकिन ईसप सबसे भारी डिब्बा उठाने लगा। उस डिब्बे में ब्रेड भरी हुई थी।

ईसप के सभी नौकर साथी उस पर हंसने लगे, फिर बोले, “तुम समझते हो कि तुम सबसे ज्यादा ताकतवर हो? इतना भारी डिब्बा उठाते हुए तुम रास्ते में ही गिर जाओगे।” नौकर साथियों की बात सुनकर ईसप कुछ नहीं बोला। उसने तुरंत वह डिब्बा उठाया और चलने लगा।

धनवान सेठ और सभी नौकरों की यात्रा आरंभ हो चुकी थी। दोपहर के समय सूरज तेजी से उनके सिर पर चमक रहा था। सभी

नौकरों को डिब्बे उठाने में बहुत परेशानी महसूस हो रही थी। बोझ के कारण ईसप भी धीरे-धीरे चल रहा था। काफी दूर चलने के बाद सेठ और उसके नौकरों ने विश्राम करने के लिए एक पेड़ के नीचे रुकने का निर्णय किया।

सभी ने ईसप को अपने डिब्बे से ब्रेड निकलने को कहा। उसने डिब्बे से कुछ ब्रेड निकाली और उसे सेठ तथा नौकरों को दे दिया। अब उसका डिब्बा पहले से हल्का हो गया था, जिसे उठाना काफी आसान था।

सभी लोग आगे की यात्रा पर चल पड़े, फिर रात को खाना खाने के लिए ही रुके। सारे नौकर थक गए थे, क्योंकि उनके डिब्बे बहुत भारी थे। ईसप ने फिर सबको खाने के लिए ब्रेड दिया। अब उसका डिब्बा पहले से भी ज्यादा हल्का हो गया था।

यह देखकर सभी नौकरों को उससे जलन होने लगी कि अब उसका डिब्बा बिल्कुल हल्का हो गया था। लेकिन ईसप एक दयालु और नेक इन्सान था। उसने बारी-बारी से अपने सभी नौकर साथियों का भार उठाने में मदद की। सभी ने उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया।

उसके साथी मन ही मन में सोचने लगे कि काश! वे भी ईसप जैसे दयालु और नेक इन्सान बन पाते। धनवान सेठ ईसप का व्यवहार और स्वभाव देखकर बहुत खुश हुआ। उसने अगले माह ईसप का वेतन बढ़ा दिया। (Small Moral Story in Hindi)  


5. मुर्गीखाना और ईसप

काफी समय पहले की बात है। ईसप नाम का आदमी एक छोटे से शहर में रहता था। वह एक धनवान सेठ के घर में नौकर था। ईसप बहुत दयालु, नेक और समझदार इन्सान था।

एक दिन ईसप एक मुर्गीखाने के बाहर खड़ा होकर वहां की मुर्गियों को घूर रहा था। उधर से गुजरने वाले लोग उसे देखकर बड़ा ताज्जुब कर रहे थे।

जैसे-जैसे समय गुजरता गया, वैसे-वैसे उसके आसपास इकट्ठा होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गई। वे सोच रहे थे कि ईसप इस तरह मुर्गियों को क्यों घूर रहा है? उस शहर के लोगों को दूसरों के निजी जीवन के बारे में जानने की आदत थी। वे इसे अपना अधिकार समझते थे।

एक आदमी ने ईसप के पास जाकर पूछा, “ईसप! तुम यहां बहुत देर से खड़े हो। क्या तुम कोई मुर्गी चुराने के बारे में सोच रहे हो?” यह कहकर वह आदमी हंसने लगा। दूसरा आदमी बोला, “हम यह सब इसलिए पूछ रहे हैं कि हमें मुर्गीखाने के मुर्गियों की चिंता है। बाकी हमें किसी के निजी जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है।”

ईसप समझ गया कि वे लोग उसे परेशान कर रहे हैं। उसने मुर्गीखाने के मुर्गों की ओर इशारा करते हुए कहा, “मैं इस मुर्गे को बहुत देर से देख रहा हूं। यह मुर्गीखाने में बहुत धड़ल्ले से घूम रहा है और सभी मुर्गे-मुर्गियों से मिल रहा है। लेकिन कोई भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा है और वह मूर्ख इन्सानों जैसा बर्ताव करने की कोशिश कर रहा है।”

ईसप की बात सुनकर सभी लोग हैरान हो गए। एक व्यक्ति बोला, “ईसप! तुम कहना क्या चाहते हो?” ईसप बोला, “हम इन्सानों की तरह यह जानवर भी कभी-कभी बड़ा बनने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब कोई उनकी ओर ध्यान नहीं देता, तो ऐसा करने के चक्कर में वे बेवकूफ बन जाते हैं।

“ईसप की ऐसी उपदेशपूर्ण बातें सुनकर वहां खड़े लोग आश्चर्य चकित हो गए। वे समझ गए कि ईसप उन्हें क्या संदेश देना चाहता है। इधर ईसप मुस्कराता हुआ अपने रास्ते पर चल पड़ा था। वास्तव में बहुत से मनुष्य अपने आपको काफी होशियार और चतुर समझते हैं। लेकिन कभी-कभी वे अपनी चालाकियों से मात खा जाते हैं। (Small Moral Story in Hindi)  


6. खेल में ईसप

एक दिन शाम के समय ईसप कहीं जा रहा था। तभी उसने देखा कि बहुत से बच्चे मैदान में खेल रहे हैं। वह भी मैदान में गया और बच्चों के साथ खेलने लगा। ईसप तरह-तरह से मुंह बनाकर जोर-जोर हंसने लगा। ऐसे में बच्चे उसे विचित्र नजरों से देखने लगे।

उसी समय ईसप का एक मित्र उधर से गुजरा और उसने ईसप को बच्चों के साथ खेलते हुए देख लिया। मित्र ने ईसप को बुलाकर कहा, “ईसप! अब तुम बड़े हो गए हो और समझदार आदमी हो। तुम्हें यह नहीं लगता कि तुम इन बच्चों के साथ खेलकर अपना समय बर्बाद कर रहे हो? तुम्हें जाकर कोई काम करना चाहिए।”

अपने मित्र की बात सुनकर ईसप चुप रहा। वह मन ही मन में कोई उत्तर देने के बारे में सोच रहा था। तभी ईसप के दिमाग में एक विचार आया। वह धीरे-धीरे एक ओर जाकर ऐसा दिखावा करने लगा, जैसे कोई चीज ढूंढ़ रहा हो। यह देखकर उसका मित्र हैरान हो गया कि ईसप क्या कर रहा है?

थोड़ी देर बाद जब ईसप उधर से वापस आया, तो उसके हाथ में तीर-कमान था। यह देखकर ईसप के मित्र ने उससे पूछा, “तुम यह तीर-कमान लेकर यहां क्यों आए हो?”

“तुम्हारे सवालों का जवाब देने के लिए।” ईसप बोला, “इन्सान का दिमाग एक तीर की तरह होता है। यदि हम इसे हमेशा तनाव में रखेंगे, तो यह भी कमान की तरह मुड़कर टूट जाएगा। यदि हम अपने दिमाग को सभी परेशानियों से दूर रखते हैं और जीवन का आनंद लेते हैं, तो यह तनाव से मुक्त सदैव तरोताजा बना रहता है।

ऐसे में हम जीवन की सभी इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूर्ण करने में समर्थ होते हैं।” ईसप का मित्र समझ गया कि वह क्या कहना चाहता है। वह जान गया कि यदि हम जीवन की भाग- -दौड़ में कुछ क्षण आराम करके नहीं बिताते, तो हम थक जाते हैं। ऐसे में हमें अनेक बीमारियां घेर लेती हैं। अतः ईसप का मित्र भी ईसप और बच्चों के साथ खेलने के लिए मैदान में चला गया। (Small Moral Story in Hindi) 


7. लकड़हारे की कुल्हाड़ी

एक बार की बात है। किसी गांव में एक लकड़हारा रहता था। वह रोजाना नदी के किनारे जाकर पेड़ से लकड़ियां काटता और उन्हें शहर में बेच देता।

एक दिन लकड़हारा एक पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां काट रहा था। तभी अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर नदी में जा गिरी। वह तुरंत पेड़ से उतरा और नदी में घुसकर अपनी कुल्हाड़ी तलाश करने लगा। लेकिन बहुत ढूंढ़ने के बावजूद उसे उसकी कुल्हाड़ी नहीं मिली।

ऐसे में लकड़हारा उदास हो गया और नदी के किनारे बैठकर रोने लगा। फिर वह भगवान से प्रार्थना करते हुए बोला, “हे भगवान, मेरी कुल्हाड़ी पानी में गिर गई। यह मेरी जीविका का एकमात्र साधन था। कृपा करके मेरी सहायता करो। मुझे मेरी कुल्हाड़ी वापस कर दो।”

तभी लकड़हारे ने देखा कि जलदेवता नदी से निकलकर बाहर आए। वे लकड़हारे की विपदा सुनकर उसकी सहायता करना चाहते थे। वे उसकी कुल्हाड़ी तलाश करने नदी में गए और सोने की एक कुल्हाड़ी लेकर बाहर निकले। वे बोले, “अरे लकड़हारे, क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

लकड़हारे ने कुल्हाड़ी देखकर कहा कि नहीं, यह उसकी कुल्हाड़ी नहीं है। जलदेवता दोबारा नदी में गए और चांदी की एक कुल्हाड़ी लेकर बाहर आए। लकड़हारे ने उसे भी लेने से इन्कार कर दिया, क्योंकि वह उसकी कुल्हाड़ी नहीं थी। जलदेवता एक बार फिर नदी में गए और लोहे की एक कुल्हाड़ी हाथ में लेकर बाहर निकले।

लकड़हारे ने तुरंत कहा कि हां, यह उसकी कुल्हाड़ी है। जलदेवता लकड़हारे की ईमानदारी से बहुत खुश हुए । उन्होंने उसे इनाम में सोने और चांदी की कुल्हाड़ियां भी दे दीं। लकड़हारा खुशी-खुशी अपने घर गया और अपने मित्रों को सारी बात बताई। यह सब सुनकर उसके मित्र हैरान हो गए।

अगले दिन लकड़हारे का एक लालची मित्र नदी के किनारे गया और अपनी कुल्हाड़ी पानी में फेंक दी। फिर वह नदी के किनारे बैठकर रोने लगा। जलदेवता नदी से बाहर आए और उससे रोने का कारण पूछा। उसने उन्हें अपनी कुल्हाड़ी नदी में गिरने की बात बताई।

जलदेवता नदी में गए और सोने की कुल्हाड़ी लेकर वापस आए। उस आदमी ने उनसे वह कुल्हाड़ी ले ली। जलदेवता उसकी बेईमानी से नाराज हो गए। उन्होंने उससे सोने की कुल्हाड़ी छीन ली और उसे उसकी लोहे की कुल्हाड़ी देने से भी इन्कार कर दिया। (Small Moral Story in Hindi) 


8. घमंडी भेड़िया

एक बार की बात है। भेड़ियों के एक परिवार में एक बलशाली भेड़िये ने जन्म लिया। उसके हाथ-पैर बहुत मजबूत थे और वह देखने में भी बहुत शक्तिशाली लगता था। वह जैसे-जैसे बड़ा होता गया, वैसे-वैसे निर्दयी और धूर्त होता गया। उसके परिवार वाले उसे गर्व से ‘शेर’ कहकर पुकारने लगे।

वह भेड़िया शक्तिशाली था, लेकिन बुद्धिमान नहीं था। वह हमेशा उल्टे-सीधे काम करता था। उसने यह भी सोचना शुरू कर दिया कि वह सचमुच एक शेर है। वह सोचता, ‘यदि ऐसा नहीं होता, तो मेरे माता-पिता मुझे शेर कहकर क्यों पुकारते?’

इस प्रकार वह भेड़िया सभी भेड़ियों के सामने शेर जैसा बर्ताव करता और उन्हें उसकी आज्ञा मानने तथा उसके सामने सिर झुकाने को कहता। एक दिन वह भेड़िया शेरों के झुंड में चला गया और वहां भी वैसा बर्ताव करने लगा, जैसा कि उसकी आदत थी। शेर उस भेड़िये को देखकर बहुत हैरान हुए, लेकिन उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा।

उस भेड़िये के क्रियाकलापों को देखकर जंगल के सभी जानवर उसकी हंसी उड़ाने लगे थे। ऐसी स्थिति में भेड़िये के माता-पिता को बहुत शर्म आती थी। लेकिन भेड़िया उनकी कोई बात नहीं सुनता था। एक दिन भेड़िये के माता-पिता ने एक बुद्धिमान लोमड़ी के पास जाकर उससे सलाह मांगी। वे बोले, “प्रिय लोमड़ी, कृपया हमारी सहायता करो।

हमारा बेटा यह भूल गया है कि वह एक भेड़िया है। ऐसे में जंगल के सारे जानवर उसका मजाक उड़ाते रहते हैं।” उन लोगों की बात सुनकर लोमड़ी ने कुछ देर सोचा, फिर उनसे बोली, “मैं भेड़िये से मिलकर बात करूंगी।”

अगले दिन लोमड़ी भेड़िये से मिलने गई। वह बोली, “मैं जानती हूं कि कोई भी अपने आपको मूर्ख कहलाना पसंद नहीं करता, जैसा कि तुम कर रहे हो। जाओ, नदी के पानी में अपना चेहरा देखो। तुम केवल एक भेड़िया हो। तुम भले ही सभी भेड़ियों में शेर की तरह लगते हो, लेकिन वास्तव में तुम एक भेड़िया हो।” लोमड़ी की बात सुनकर भेड़िये को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अपनी आदतें सुधार लीं। (Small Moral Story in Hindi) 


9. सारस और मोर

एक बार की बात है। किसी गांव के पास एक जंगल था। उस गांव के बहुत से बच्चे अक्सर जंगल में जाकर पक्षियों को देखा करते थे। उनके मनपसंद पक्षी सारस और मोर थे।

मोर के राजसी, नीले रंगों वाले पंख बहुत सुंदर लगते थे। सभी बच्चे मोर को देखने जाते थे। मोर को यह बात मालूम हो गई कि सारे बच्चे उसे देखने आते हैं। जब वह बच्चों के आने की आवाजें सुनता, तो अपने पंख फैलाकर नाचने लगता।

बच्चों को उसके रंग-बिरंगे पंख बहुत अच्छे लगते थे। मोर का नाच देखने के बाद सारे बच्चे तालाब की ओर जाते और सारस को देखते, जो अपनी चोंच से मछलियां पकड़ता था। बच्चों को देखकर सारस अपने सफेद पंख फैला लेता और हवा में लहराता हुआ उड़ जाता।

एक दिन सारस मोर के घर के पास से गुजर रहा था। मोर ने सारस से कहा, “सफेद पंखों वाले हे मामूली पक्षी, तुम कितन अजीब लगते हो, जबकि मेरे पंख बहुत सुंदर और रंग-बिरंगे हैं।”

मोर की ऐसी बात सुनकर सारस ने कहा, “अरे धूर्त मोर, यह ठीक है कि तुम्हारे पास रंग-बिरंगे पंख हैं, लेकिन उड़ते समय मैं अपने पंख फैलाकर आसमान को छू लेता हूँ। मैं बादलों में भी जाकर छलांग लगा सकता हूँ। क्या तुम ऐसा कर सकते हो?”

मोर ने जल-भुनकर अपने पंख फैलाए और नाचने लगा। लेकिन जल्दबाजी में पैर फिसल जाने से उसके पंख गंदे हो गए और टूट गए।
सारस बोला, “हे मोर, तुम्हें दूसरे पक्षियों का भी सम्मान करना चाहिए। देखो, तुम्हारा क्या हाल हुआ।” यह कहकर सारस ने अपने पंख फैलाए और आसमान में उड़ गया।

मोर अपना-सा मुंह लेकर खड़ा रह गया। उसकी समझ में आ गया था कि हमें किसी का भी मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। सभी अपने-अपने गुणों के साथ इस धरती पर आए हैं। वस्तुतः भगवान ने प्रत्येक प्राणी को कोई न कोई गुण अवश्य दे रखा है।

ऐसे में सभी प्राणियों का अपना-अपना अलग महत्व है। कोई भी प्राणी तुच्छ या हीन नहीं है। अतः हमें सभी प्राणियों का सम्मान करना चाहिए। किसी की आलोचना करना अच्छी बात नहीं है।(Small Moral Story in Hindi)  


10. दुष्ट साही

एक दिन दोपहर के समय एक साही जंगल में इधर-उधर भटक रहा था। उसने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। उसके पास रहने के लिए कोई उचित स्थान नहीं था। वह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक घूमता रहा, लेकिन अपने लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं ढूंढ़ सका।

अब साही चलते-चलते थक गया था और निढाल हो रहा था। अचानक उसे एक पेड़ में खोखल दिखाई दिया। उसने सोचा, ‘यह तो अच्छी जगह लगती है। मैं यहां रह सकता हूं। लेकिन मुझे पहले देख लेना चाहिए कि यह स्थान सुरक्षित है या नहीं।’ यह सोचकर साही खोखल के पास गया। उसने देखा कि वहां कुछ सांप रहते थे।

साही ने सांपों से प्रार्थना की, “प्यारे सांपो। कृपा करके मुझे यहां रहने दो। मेरे पास रहने की कोई जगह नहीं है। मैंने कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया है। मैं सारा दिन जंगल में इधर-उधर भटकता रहा हूँ।”

सांपों को साही पर दया आ गई। उन्होंने कुछ क्षण सोचा, फिर बोले, “ठीक है साही, तुम चिंता मत करो। खोल के अंदर आ जाओ। तुम हमारे साथ रह सकते हो। हम तुम्हें कुछ खाने को भी देते हैं।”

फिर सांप और साही मिलकर प्रसन्नतापूर्वक उस खोखल में रहने लगे। लेकिन कुछ दिनों बाद साही मोटा होने लगा। वह सारा दिन कुछ न कुछ खाता रहता था। सांपों को अपने खोखल में रहने में तकलीफ होने लगी थी, क्योंकि अब वहां स्थान कम होने लगा था। इसका कारण यह था कि साहा रात को सोने के लिए सारी जगह ले लेता था।

उसकी पीठ के पंख बहुत नुकीले थे, जो सांपों को चुभते रहते थे। एक दिन सांपों ने साही से कहा, “देखो साही, तुम यहां बहुत दिनों से रह रहे हो। अब तुम्हें यह खोखल छोड़कर किसी दूसरी जगह चले जाना चाहिए, क्योंकि यह स्थान हम सबके लिए छोटा पड़ने लगा है और हमें रात को सोने में भी बहुत परेशानी होती है।”

सांपों की बात सुनकर दुष्ट साही ने उत्तर दिया, “मुझे यहां किसी से कोई परेशानी नहीं है। मैं यहां आराम से रह रहा हूं। यदि किसी को इस खोखल में रहने से परेशानी हो रही है, तो वह यहां से जा सकता है।” 


11. पाइक और समुद्री मछली

किसी नदी में एक पाइक मछली रहती थी। वह नदी आगे जाकर समुद्र से मिल जाती थी। पाइक बहुत बड़ी मछली थी और उसका परिवार भी बड़ा था। उसे छ: बच्चों वाले अपने परिवार पर बहुत गर्व था। पाइक मछली रोजाना अपने बच्चों के लिए खाना लाकर उन्हें खिलाती थी।

एक दिन पाइक मछली खाने की तलाश में नदी में घूम रही थी। तभी अचानक एक बड़ी लहर आई और उसे बहाकर समुद्र में ले गई। पाइक मछली ने समुद्र की लहरों में तैरकर अपने आपको वापस नदी में लाना चाहा, किंतु वह ऐसा करने में असफल रही।

पाइक मछली ने अपने आसपास देखा-वहां की सारी मछलियां उससे छोटी थीं। समुद्री मछलियां किसी नदी की इतनी बड़ी मछली देखकर हैरान हो गईं। लेकिन वे उससे बातें करने लगीं पाइक मछली को अपने बड़े आकार पर बहुत गर्व था। वह समुद्र की छोटी मछलियों पर हंसती और उनसे कहती, “मैं तुम सबसे बड़ी और सुंदर मछली हूं। मैं तुम्हें एक पल में बहाकर बहुत दूर ले जा सकती हूँ।”

पाइक मछली ने सोचा कि क्यों न वह समुद्र के पानी में ही रहे। अपने बड़े आकार के कारण एक दिन वह उन मछलियों की रानी बन सकती है। पाइक मछली सारा दिन अपने परिवार और बच्चों के बारे में बातें करती थी। वह छोटी मछलियों को इशारा करके कहती कि वे कितनी छोटी हैं और किसी काम की नहीं हैं।

समुद्र की मछलियां पाइक मछली के व्यवहार से खुश नहीं थीं, लेकिन वे चुप रहती थीं।एक दिन पाइक मछली की बातें सुनकर समुद्र की एक मछली से न रहा गया। वह बोली, “अरी! ओ बड़ी मछली, हम समुद्री मछलियों की बेइज्जती करना बंद करो।

यह हमारी शराफत है कि हमने तुम्हें यहां समुद्र में रहने की इजाजत दी। लेकिन तुम हमारी बुराइयां करती रहती हो। तुम नदी में रहने वाली मछली हो। हम छोटी भले ही हैं, लेकिन जब कोई मछुआरा हमें पकड़ता है, तो बाजार में बिक जाती हैं और उसे अच्छे पैसे मिलते हैं। लेकिन तुम्हें बेचकर तो केवल कुछ सिक्के ही प्राप्त होते हैं।” 


12. चूहे पकड़ने वाली

किसी शहर से बाहर एक छोटा- -सा घर था। उस घर में बहुत से छोटे-छोटे चूहे थे। वे सभी सारा दिन बड़े मजे से घर में इधर-उधर घूमते रहते और रसोईघर में रखा रोटी, मक्खन आदि खा जाते।

घर का मालिक उन चूहों से बहुत परेशान था। तभी उसके मस्तिष्क में एक विचार कौंधा। वह पास के बाजार में गया और वहां से एक बिल्ली खरीद लाया। यह बिल्ली चूहों को पकड़ने के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। उसे लोग, ‘चूहे पकड़ने वाली’ कहते थे।

बिल्ली ने आते ही सारे घर को ठीक से देखा और यह पता लगा लिया कि चूहे कहां रहते हैं। वह रोजाना एक चूहे का पीछा करती और उसे पकड़कर मार डालती। वह मरा चूहा उस बिल्ली का भोजन बनता। यह सब देखकर चूहों ने एक बैठक की, जिसमें सभी चूहे शामिल हुए।

एक चूहा बोला, “प्यारे साथियो, हमें इस बिल्ली से कैसे छुटकारा मिल सकता है। वह बहुत तेज है और हमारे कई साथियों को मारकर खा चुकी है।”पहले चूहे की बात सुनकर दूसरा चूहा बोला, “वह बिल्ली ऊंची अलमारियों पर नहीं चढ़ सकती। आज से हम लोग अलमारियों के ऊपर रहेंगे। हमें चतुर बनकर अपनी जान बचानी होगी।”

उस दिन के बाद बिल्ली ने किसी भी चूहे को घर में इधर-उधर भागता नहीं देखा। चूहे न मिलने के कारण बिल्ली कमजोर होने लगी थी। घर के मालिक ने भी उसे खाना देना बंद कर दिया था। वह उसे चूहे मारने को कहता था। ऐसे में बिल्ली काफी दुबली और कमजोर होती चली गई।

एक दिन बिल्ली ने एक खूंटी से लटककर अपनी जान देने का विचार किया। वह अपनी पिछली टांगों को खूंटी में फंसाकर लटक गई। सभी चूहों ने अलमारी के ऊपर से उसे देखा। तभी एक छोटे चूहे ने बिल्ली की ओर इशारा करते हुए कहा, “अरे! तुम कितनी चालाक बिल्ली हो। तुम समझती हो कि इस तरह लटककर खाने के थैले जैसी बन जाओगी और हमें पकड़ लोगी।

यह तुम्हारी भारी भूल है। तुम हमें पकड़ने हमारे पास नहीं आ सकतीं।”चूहे की बात सुनकर बिल्ली को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह तो भूख से परेशान होकर अपनी जान देना चाहती थी, मगर चूहों को यह सब नाटक लग रहा था। वह असहाय होकर चूहों को देखती रही। (Small Moral Story in Hindi) 


13. बाज की उड़ान

काफी पुरानी बात है। एक दिन शाम को एक बाज अपने मित्रों से मिलकर अपने घर वापस आ रहा था। वह बहुत भूखा था, अतः उसने सोचा कि क्यों न कोई शिकार पकड़ा जाए। फिर उसने आसमान में उड़ते समय अपनी तेज निगाहों से शिकार ढूंढना शुरू कर दिया।

थोड़ी ही दूरी पर बाज को एक मरी बकरी दिखाई दी। उसने सोचा, आज का दिन बहुत अच्छा है।’ यह सोचकर वह बकरी के पास पहुंचा और उसे नोचना शुरू कर दिया।लेकिन शीघ्र ही बाज को पता चल गया कि पक्षियों को पकड़ने के लिए शिकारी द्वारा जाल में वह बकरी रखी गई है। ऐसे में बाज भयभीत हो गया।

वह जान गया कि जब कोई पक्षी उस बकरी को खाने आएगा, तो वह पकड़ा जाएगा। मगर बाज बहुत भूखा था। जैसे ही उसने बकरी को खाना, शुरू किया, शिकारी ने आकर उसे पकड़ लिया और पिंजरे में बंद कर दिया। वह शिकारी बाज को एक मुर्गीखाने में ले गया।

फिर वहां उसके पंख काट दिए गए,ताकि वह उड़ न सके। ऐसे में बाज को अपने घर की याद आने लगी। वह रोजाना अपने बच्चों को याद करता और उदास हो जाता।एक दिन एक आदमी मुर्गीखाने में आया और बाज को खरीदकर ले गया।

वह आदमी चाहता था कि बाज के पंख दोबारा उग आएं, ताकि वह फिर से उड़ सके। बाज ने अपने मालिक का बहुत आभार माना।एक दिन मालिक के कहने पर बाज काफी दूर तक उड़ा और एक खरगोश मारकर ले आया। बाज ने वह खरगोश अपने मालिक को बतौर तोहफा दे दिया, जिसने उसकी जान बचाई थी।

उसके बाद बाज ने अपने मालिक की हर बात माननी शुरू कर दी। मालिक जैसा कहता, बाज वैसा ही करता। उसका मालिक जहां भी जाता, बाज भी उसके साथ उड़ता हुआ जाता।एक दिन एक बुद्धिमान लोमड़ी ने बाज से कहा, “प्यारे बाज, तुम अपने मालिक के प्रति हमेशा वफादार रहना।

उससे किसी भी तरह की कोई चालाकी मत करना। उसने तुम्हारी जान बचाई है और उसी के कारण तुम्हें दोबारा पंख मिले हैं। तुम बिना पूछे कहीं उड़कर मत जाना। अगर तुम उसे नहीं मिले, तो वह तुम्हें पकड़ लेगा और तुम्हारे पंख काट देगा।”


14. राजा कौन बनेगा?

एक बार की बात है। किसी छोटे से टापू पर एक मेढक और एक चूहा रहते थे। वे दोनों काफी दिनों से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन थे। वे कभी भी एक साथ नहीं दिखते थे। उनमें प्रायः इस बात पर लड़ाई होती थी कि उस टापू का राजा कौन बनेगा?

मेढक और चूहा-दोनों खूंखार तथा शक्तिशाली थे। वे जानते थे कि किस तरह अपनी जान बचानी है और टापू पर कहां भागना है। उन दोनों में राजा बनने को लेकर हुई लड़ाइयों का कोई नतीजा नहीं निकलता था। इसका कारण यह था कि दोनों एक दूसरे पर भारी पड़ते थे।

एक दिन चूहे ने ऐलान किया, “अरे मेढक, आज हम खुलकर लड़ते हैं। देखते हैं कि इस लड़ाई के बाद कौन जिंदा बचता है।” मेढक ने खुशी-खुशी चूहे की चुनौती स्वीकार कर ली। अगले दिन चूहा और मेढक लड़ाई के लिए एक स्थान पर मिले।

वे दोनों अपने साथ घास से बनी नुकीली तलवार और एक बड़े पत्ते से बनी ढाल लेकर आए थे। वे दोनों एक दूसरे को मार डालना चाहते थे। जब वे लड़ने को तैयार हुए, तो सारे जानवर उनके आसपास खड़े हो गए और अपने-अपने साथी का हौसला बढ़ाने लगे। चूहा उन जानवरों को काफी प्रिय था।

बहुत से जानवर चाहते थे कि चूहा ही उनका राजा बने। चूहे और मेढक में बहुत देर तक लड़ाई होती रही। वे बुरी तरह जख्मी हो गए, लेकिन लगातार लड़ते रहे। उनमें से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। वे दोनों अपने-अपने सारे पैंतरे आजमा रहे थे, लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि उनमें से कौन जीतेगा।

जब चूहे और मेढक में घमासान लड़ाई हो रही थी, तो ठीक उनके सिर के ऊपर आसमान में एक बाज उड़ रहा था। जब उसने दो जानवरों को लड़ते हुए देखा, तो वह नीचे आ गया। उसने अपने पंजों से दोनों को पकड़ा और उन्हें लेकर आसमान में उड़ गया।

आज उसे खाने के लिए बहुत बढ़िया भोजन मिला था। इसीलिए कहा गया है कि आपस में लड़ाई-झगड़ा करना अच्छी बात नहीं है। अगर हम ऐसा करते हैं, तो उससे हमारा ही अहित होता है और कोई दूसरा इसका लाभ उठा लेता है।


15. वफादार कुत्ता

काफी समय पहले की बात है। किसी गांव में एक चरवाहा रहता था। उसके पास भेड़ों का बहुत बड़ा झुंड था। उसने एक कुत्ता पाल रखा था, जो उसके भेड़ों की रखवाली करता था।

चरवाहा रोजाना भेड़ों को खेत में ले जाता, जहां वे मजे से हरी-हरी घास चरतीं और अपना पेट भरतीं। जितनी देर वे घास खाती रहतीं, वह कुत्ता उनके आसपास घूमता रहता। चरवाहा कुत्ते को खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े भी देता था।

शाम होने पर भेड़ें, चरवाहा और कुत्ता-सभी लोग गांव वापस आ जाते। भेड़ें कुत्ते को पसंद नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि कुत्ते को अपने ऊपर बड़ा घमंड है, इसलिए वह उनसे बात नहीं करता। एक दिन सभी भेड़ें चरवाहे के पास गईं और बोलीं, “मालिक! हमें आपसे एक बात कहनी है। हम भेड़ों को हमेशा भेड़ियों से डर लगा रहता है। हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं भेड़िये हमारे बच्चों को उठा न ले जाएं।

इसके बदले तुम हमेशा हमें खाने के लिए केवल घास ही देते हो। वह घास तो मुफ्त में मिलती है, जिसके लिए तुम्हें कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। लेकिन वह कुत्ता सारा दिन हमारे आगे-पीछे घूमता रहता है और कोई काम नहीं करता। फिर भी तुम उसे खाने के लिए मांस देते हो और हमेशा उसकी तारीफ के पुल बांधते हो। यह तुम्हें शोभा नहीं देता।”

उस समय कुत्ता एक और खड़ा भेड़ों की बातें सुन रहा था। वह तुरंत छलांग मारकर उनके सामने आ गया और बोला, “तुम मुझे बेकार कह रही हो, जबकि तुम्हें मेरा उपकार मानना चाहिए। मैं तुम्हारी निगरानी के दौरान इस बात का ध्यान रखता हूं कि कोई भेड़िया तुम्हारे पास न फटक सके। अगर मैं ऐसा न करूं, तो तुम सब मारी जाओ।”

कुत्ते की सच बात सुनकर बेचारी भेड़े अपना-सा मुंह लेकर रह गईं और चुपचाप वहां से चली गई। उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि उन्होंने कुत्ते के बारे में जो कुछ कहा, वह वास्तव में गलत था। कुत्ता वाकई उनकी भलाई का काम कर रहा था।


16. सूअर के दांत

एक बार किसी जंगल में सूअरों का एक दल रहता था। सभी सूअर सुख-शांतिपूर्वक अपना जीवन बिता रहे थे। उन्हें किसी, भी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती थी। वे सदैव एक दूसरे के सुख-दुख में काम आते लेकिन इधर कई वर्षों से शिकारी इस जंगल में सूअरों का लगातार शिकार कर रहे थे वे सूअरों को पकड़कर अपने गांव ले आते और उन्हें मारकर खा जाते।

एक दिन सूअरों ने निश्चय किया कि वे एक पहरेदार रखेंगे, जो दुश्मनों और शिकारियों से उनकी रक्षा करेगा।पहरेदार रखने का परिणाम यह हुआ कि अब न तो कोई जानवर उनके पास आता था और न ही उन्हें परेशान करता था।

वह पहरेदार हमेशा उनसे लड़ने के लिए तैयार रहता था। पहरेदार रोजाना एक पेड़ के पास खड़ा रहता और अपने दांतों को तेज करता रहता। ऐसे में बहुत तेज आवाज आती थी। जंगल के जानवर यह समझते थे कि कोई व्यक्ति पेड़ काट रहा है।

एक दिन दोपहर के समय खाना खाने के बाद वह सूअर उस पेड़ की ओर गया और अपने दांत तेज करने लगा। तभी उधर से एक लोमड़ी गुजरी। उसने देखा कि सूअर अपने दांत तेज कर रहा है। लोमड़ी समझ गई कि सूअर लड़ाई के लिए तैयार हो रहा है।

तब लोमड़ी ने अपने आसपास देखा, लेकिन उसे कोई शिकारी नहीं दिखाई दिया। वह हैरान हो गई कि जब यहां कोई शिकारी नहीं है, तो यह सूअर अपने दांत क्यों तेज कर रहा है। लोमड़ी अपने आपको न रोक सकी और उसने सूअर से पूछा, सूअर भाई, तुम अपने दांत क्यों तेज कर रहे हो? क्या जंगल में कोई शिकारी आया है? क्या हमें भी सावधान रहने की जरूरत है?” अरे!

सूअर उसी तरह अपना काम करता रहा। उसने इस तरह दिखावा किया. मानो उसने लोमड़ी की बात सुनी ही न हो। लेकिन सूअर को पता था कि लोमड़ी उसका जवाब सुने बिना नहीं जाएगी। अतः उसने दांत तेज करने का काम रोक दिया और लोमड़ी से बोला, “क्या तुम समझती हो कि कोई शिकारी आने से पहले हमें बताएगा कि वह हमें मारने के लिए आ रहा है? वह तो कभी भी आ सकता है।

इसलिए मैं हमेशा अपने दांतों को तेज रखता हूं। हमें कभी भी उनका सामना करना पड़ सकता है।” यह कहकर पहरेदार सूअर अपना दांत फिर तेज करने लगा। लोमड़ी अपना-सा मुंह लेकर चली गई। वास्तव में कहा था-हमें आने वाले संकट से बचने के लिए हमेशा सावधान रहना चाहिए।

सूअर ने बुरा वक्त कभी बताकर नहीं आता। अगर हम संकट आने पर उसका उपाय सोचते हैं, तो तब तक काफी देर हो चुकी होती है। अत: संकट आने से पहले ही उस बारे में अनुमान लगाकर उसका समाधान कर लेना चाहिए।


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